उत्तराखंड में नैनीताल के समीप भीमताल मार्ग पर स्थित “लोक संस्कृति संग्रहालय” की स्थापना करने वाले पद्मश्री डॉ.यशोधर मठपाल पाषाण गुफा चित्रों के एक विश्वप्रसिद्ध विद्वान हैं।
29 जून को पंतनगर, उत्तराखंड में आयोजित एक कार्यक्रम में उनसे भेंट करने का सौभाग्य मिला। बड़ी ही सुखद अनुभूति हुई जब उन्होंने मुझसे श्रद्धेय हरिभाऊ वाकणकर, श्रद्धेय बाबा योगेंद्र जी एवं महाराष्ट्र के बारे में शुद्ध मराठी में आत्मीय चर्चा की।
आपने दुनियाभर के कई देशों में जाकर इस विषय का अध्ययन किया है। जीवनभर संकलित और संग्रहित की इस विषय से संबंधित दुर्लभ जानकारियाँ उन्होंने अपने निवास के पास ही एक संग्रहालय में संजोकर रखी हैं ताकि कला, चित्रकारी और संस्कृति में रुचि रखने वाले शोधार्थी, विद्यार्थी एवं नई पीढ़ी के युवा इसको देख सकें, इसका उपयोग कर सके।
6 जून 1939 को अल्मोड़ा जिले के नौला ग्राम में जन्मे डॉ. यशोधर मठपाल ने रानीखेत में प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर, लखनऊ से ललित कला में पांच वर्षीय डिप्लोमा कर स्वर्ण पदक हासिल किया। उसके बाद आगरा में पढ़ाई की। पूना के डेक्कन कॉलेज से पुरात्व में पीएचडी हासिल की। अपने गुरु प्रसिद्ध पुरातत्वविद् पद्मश्री हरिभाऊ वाकणकर का भी आपको मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। डॉ. मठपाल ने दुनिया के अनेक देशों में गुफाओं के पाषाण युगीन चित्रों का अध्ययन कर दो सौ के क़रीब शोध पत्र तैयार किए हैं।
डॉ मठपाल स्वयं भी एक सिद्धहस्त चित्रकार हैं अध्ययन के साथ-साथ उन्होंने पाषाण चित्रों की हू-ब-हू प्रतिकृतियां भी बनाई हैं। डॉ मठपाल का मानना है कि पाषाण युग में आदि मानव द्वारा पत्थरों पर उकेरे गए चित्रों को संभाल कर रखने का यही एक मात्र उपाय है। उनके इस दावे को 1986 में इंग्लैंड में हुए विश्व पुरातत्व सम्मेलन में भी मान्यता मिली।
ऋषियों सा साधारण त्यागमय जीवन व्यतीत कर रहे 85 वर्षीय डॉ. मठपाल ने गुफा चित्रों के साथ-साथ लोक संस्कृति से जुड़ी कई वस्तुओं को समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके इस प्रयास को यूनेस्को द्वारा भी मान्यता प्रदान की गई।
डॉ. मठपाल ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप आदि देशों की पौराणिक गुफाओं में सालों रहकर एक-एक चित्र पर शोध किया और उनकी वास्तविक आयु और कला के बारे में दुनियाभर के पुरातत्व विशेषज्ञों का मार्गदर्शन किया। देश-दुनिया में तीस से ज्यादा शहरों में आदि मानव के चित्र, पाषाण युग के पत्थर, जीवाश्म, आदि वस्तुओं की प्रदर्शनी लगा चुके डॉ मठपाल ने उत्तराखंड के भीमताल में अपना घर बसाया और यही 1983 में एक अनूठे लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना की।
डॉ यशोधर मठपाल को 2006 में राष्ट्रपति द्वारा चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
2012 में उन्हें नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित “रॉक कला पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन” में भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मान दिया गया। उन्हें राष्ट्रीय कला श्री सम्मान और उज्जैन का प्रतिष्ठित कालीदास सम्मान भी प्राप्त है।
भारतीय कला एवं संस्कृति के महान संवाहक इस महान कला ऋषि को सादर नमन है।
डॉ. पुरुषोत्तम पाटील
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