अभी "मूड" नहीं है...!
भारत विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। सिंधु सरस्वती सभ्यता इसका प्रमाण है। अब तक खोजे गए हड़प्पाकालीन नगरों में वह सारी सुविधाएं मिलती हैं जो आज की आधुनिक टाउनशिप में उपलब्ध हैं।सिंधु घाटी सभ्यता में घरों से निकलने वाले गंदे पानी को सोखने के लिए पक्की ईंटों से बनी नालियों का एक जटिल नेटवर्क था, जो मुख्य नालियों से जुड़कर शहर के बाहर निकलती थी। इस सभ्यता के शहरों में घरों में स्नानागार, शौचालय और पक्की ईंटों से बनी ढकी हुई नालियों का एक विस्तृत नेटवर्क था, जो कचरा और गंदे पानी के कुशल निपटान में मदद करता था। सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में सड़कों के किनारे कूड़ेदान भी पाए गए हैं, जो कचरा प्रबंधन में मदद करते थे। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि भारतीय संस्कृति में साफ़ सफ़ाई का पुराने समय से ही कितना महत्व रहा है। यह 4500 साल पहले की बात है, जब दुनिया के अन्य हिस्सों में स्वच्छता की बुनियादी समझ भी नहीं थी। यह इस बात को भी सिद्ध करता है कि हम पहले से ही इतने गंदे नहीं थे?
फ़िर आख़िर बाद में ऐसा क्या हुआ जो हम इतने गंदगी पसंद हो गए कि जहां खाते वहीं थूंकने के लिए पीकदान भी रखने लगे?
स्वच्छता जागरूकता के लिए चलाए गए कई कार्यक्रमों जैसे केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1986, पूर्ण स्वच्छता अभियान 1999, निर्मल भारत अभियान 2012 के बाद एक बार फिर एक नए "स्वच्छ भारत अभियान" की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अगस्त 2014 के स्वतंत्रता दिवस पर की थी और 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयंती पर इसका शुभारंभ किया गया। इस दिन, मोदीजी ने भारत के नई दिल्ली के राजघाट में आयोजित एक सार्वजनिक सभा में भारत के नागरिकों को संबोधित किया और सभी से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया। लेकिन भारतीय किसी की सुनते हैं भला!
हम भारतीय इतने हठधर्मी हैं कि चाहें तो अच्छे अच्छों की सहज ही छुट्टी कर दें और न चाहें तो किसी के बाप में दम नहीं कि हमसे किसी बुरी बात का विरोध करवा ले, किसी बुरी व्यवस्था के विरोध में बुलवा ले। हमारा "मूड" जिसे हम प्यार से सहनशक्ति कहते हैं बड़ा ही गज़ब है। हम वर्षों तक मुगलों को सहते रहे, पुर्तगालियों को सहते रहे, अंग्रेजों को सहते रहे लेकिन मजाल है कि कोई उन्हें हमसे दूर कर उनसे छुटकारा दिलवा पाता, क्योंकि हमारा "मूड" नहीं था। आख़िर जब हमारा "मूड" हुआ तभी हमने उनको दूर किया। गंदगी का मामला भी कुछ ऐसा ही है। जब तक हमारा "मूड" नहीं बनेगा तब तक दुनिया की कोई शक्ति महाशक्ति हमसे उसे दूर नहीं कर सकती।
यह हमारी प्रबल इच्छाशक्ति का ही परिचायक है कि आज तक इतने स्वच्छता कार्यक्रम चलाए गए लेकिन कोई भी कार्यक्रम हमें तनिक भी प्रभावित नहीं कर सका। हम जैसे थे वैसे ही हैं और वैसे ही रहेंगे भी!
सरकार का क्या है वह अपना काम करे हम अपना कर रहे हैं। कोई भी सरकार जनभावनाओं से खिलवाड़ तो नहीं कर सकती और इस तरह किसी अभियान की आड़ में हम पर स्वच्छता थोंप नहीं सकती। यह स्वच्छ भारत मिशन भी कचरे के ढेर पर ही औंधे मुंह पड़ा है?
हमने महात्मा गांधी का अभियान "फेल" कर दिया और लड़ते रहे! संजय गांधी का अभियान "फेल" कर दिया और बढ़ते रहे! फिर मोदी जी की क्या बिसात कि वे अपना स्वच्छता अभियान हमसे सफल करवा लें! सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी लेकिन गंदगी रहनी चाहिए! क्योंकि अभी हमारा "मूड" नहीं है।
डॉ. पुरुषोत्तम पाटील
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