शनिवार, 11 अगस्त 2018

सावधान ! बचपन वयस्क हो रहा..........

आज बेटे की स्कूल में कक्षा प्रथम से चतुर्थ स्तर के विद्यार्थियों के पालकों की बैठक आयोजित की गई थी, यूँ तो हर महीने प्रत्येक कक्षा की पृथक बैठकें होती ही हैं किन्तु आज सभी की संयुक्त बैठक आयोजित की गई थी। वैसे तो बैठकों में अकादमिक गैर अकादमिक विषयों के अलावा कुछ और चर्चा नहीं होती किन्तु इस बार की बैठक का विषय जब सुना तो मैं स्तब्ध रह गया, विषय था पहली से चौथी तक के विद्यार्थियों के व्यवहार में आ रहे बदलाव। स्कूल की प्रमुख ने जब बोलना आरम्भ किया और जब विषय की गहराई से चर्चा आरंभ की तो जैसे जैसे वे बोल रहीं थी त्यों त्यों सारी बाते सुनकर मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो रहे थे। उनके सारे भाषण का सार कुछ यूँ था -
१. अधिकाँश बच्चे स्कूल में आपस में मारपीट करने लगे हैं, यहां तक कि एक दूसरे का गला तक दबाने की कोशिश करने लगे हैं। यह कुछ हद तक सामान्य है।
२. कई बच्चे एक दूसरे को वयस्कों की भाँति भद्दी और गंदी गालियां देने लगे हैं।
३.  कुछ बच्चे टी वी सीरियल और मोबाइल गेम्स के काल्पनिक और हिंसक पात्रों की तरह बर्ताव करने  लगे हैं।
४. पहली से पांचवी के विद्यार्थियों के टॉयलेट की दीवारों पर  अपनी शिक्षिका के बारे में अभद्र टिप्पणियाँ लिखी पाई  गईं।
५. एक बच्चे की पुस्तिका में लिखा मिला " She is Very Sexy"।
   इसके अलावा भी कई बातें और थीं, मेरे कानों में सिर्फ सिस्टर के शब्द ही  सुनाई पड़  रहे थे मेरा शरीर अवश्य उस सभागार में था किन्तु मन वर्षों आगे पहुँच चुका  था और मैं मन ही मन यह कल्पना करने लगा कि जब यही बच्चे ग्यारहवीं -बारहवीं  या महाविद्यालय में पहुंचेंगे तो मंजर क्या होगा।
  बात गंभीर है जिसके बारे में हम सभी को सोचना ही नहीं अपितु इस स्थिति को नियंत्रित करने हेतु कदम भी उठाना है। सबसे पहले तो बच्चों को मोबाइल से दूर रखना है क्योंकि यही एक माध्यम है जहाँ से इन कोमल मस्तिष्कों को खाद पानी मिलता है। अब इस बहस में पड़ने का कोई फायदा नहीं कि मोबाईल अच्छा है या बुरा?
बच्चे मोबाईल का उपयोग नहीं करेंगे तो कोई ख़ासा फ़र्क उनकी क्षमता पर पड़ेगा ऐसा मुझे नही लगता हाँ उपयोग करेंगे तो नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावनाएँ ज़्यादा हैं। दूसरी बात है बच्चों से निरंतर संवाद बनाएँ रखें अन्यथा वे संवाद और सहवास के दूसरे साधन खोजने लगेंगे, अच्छे या बुरे अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार, और एक बार उन्हें वह तिलस्मी जग भा गया तो फिर बाद में आप उनमें कितनी ही रुचि लें वे आपमें रुचि नहीं लेंगें।
समय रहते हमें ध्यान देना ही होगा वरना हमें गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
अंत में "अता आबेदी" की इन पंक्तियों से अपनी बात ख़त्म करता हूँ-
अपनी मंज़िल पाना है
हम को आगे जाना है
रस्ता है पुर-ख़ार तो क्या
चलना है दुश्वार तो क्या
आगे है दीवार तो क्या
दीवारों को ढाना है
हम को आगे जाना है
अपनी मंज़िल पाना है
इल्म से अल्लाह और नबी
इल्म से अपनी ये हस्ती
इल्म से दीन और दुनिया भी
दीन और दुनिया पाना है
हम को आगे जाना है
अपनी मंज़िल पाना है
अम्न से हम हैं और तुम भी
अम्न है रौनक़ दुनिया की
अम्न से दुनिया है बाक़ी
दुनिया को समझाना है
हम को आगे जाना है
अपनी मंज़िल पाना है
दर्स है ये हर-चंद अदक़
क्यूँ हो इस का हमें क़लक़
माज़ी से अब ले के सबक़
मुस्तक़बिल चमकाना है
हम को आगे जाना है
अपनी मंज़िल पाना है