"समय का बचपन"
बचपन होता है हमारा और आपका
होता ही है सबका, अपना -अपना
होता तो इनका भी है और उनका भी
अंतर होता है बस...
सुविधाओं का, खिलौनों का, मैदान का और खेल की रंग बिरंगी पोशाकों का भी
बचपन मोहताज नहीं होता इन छद्म व्यापारिक प्रतीकों का
वह तो होता ही निश्छल है
बहते झरने सा
जहां राह मिले दौड़ता भागता
जहां मिले थाह वहां कुछ रुक -रुक जाता
लेकिन मानने से ही तो है,अच्छा भी और बुरा भी और कई बार ठीक भी
सभी के हिस्से में कहाँ होता है बचपन; बचपन वाला
कुछ चूक जाते हैं जन्म लेने के बाद भी बचपन से
नहीं आता बचपन कभी जीवन में उनके
हो जाते हैं वे सीधे बड़े
किसी टाईम मशीन के प्रभाव से मानो
हां, समय ही तो है सब कुछ
जो करवाता है अहसास
सुख का कभी -कभी
तो दुख का; हमेशा
क्योंकि सबके हिस्से का समय सरीखा नहीं होता....
डॉ. पी. पुरुषोत्तम
चित्र: मेरे द्वारा खींचा गया। स्थान: कानपुर सेंट्रल रेल्वे स्टेशन से लगी बस्ती।
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