"माल-ए-ग़नीमत"
"एक मुसलमान या हिन्दू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता" यह बात प्रसिद्ध लेखक कृष्ण चंदर नें कई वर्षों पूर्व अपनी चर्चित पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' में कही थी और कमाल की बात है कि यह अब भी उतनी ही प्रासंगिक है।
लगता है ' माल-ए-ग़नीमत' समझे जाने वाले गधों के अच्छे दिन आने वाले हैं। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि हाल ही में सरकार ने आदेश जारी कर निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के गधों की आर्थिक स्थिति पर नज़र रखी जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि किसी भी गधे को किसी भी प्रकार की तकलीफ से ना गुज़रना पडे़, चाहे वह आर्थिक, सामाजिक या फिर शारीरिक ही क्यों ना हो।
हर गधे को कानून के तहत अपनी इच्छानुसार वि'चरण' करने की आज़ादी है, और यदि कोई आदमी उसके अधिकारों में रोडा अटकाता है तो इसकी सूचना तुरंत शासन को दी जाये। गधे हमारी सनातन संपत्ति हैं और इनका संरक्षण और संवर्द्धन हर जागरूक सरकार का दायित्व है। इसी तरह नस्लीय भेदभाव ना करते हुए हर नस्ल के गधों को समान सुविधाएँ देना सरकार का परम कर्तव्य है। हमारे एक चाचाजी हैं जो हमेशा एक उलाहना हमें देते हैं कि " बेटा कैसे दिन फिर गए हैं घोडों को घास नसीब नहीं और गधे गुलाब जामुन खा रहे हैं।"
मामला चाहे जो भी हो देर ही से सही आदमियों की सरकार ने गधों की सुध ली तो, और फिर कर्ज़ माफी और मुफ़्त में मिलने वाली तमाम सुविधाओं के चलते आदमी तो काम करने से रहे, सो सारा दारोमदार अब गधों पर ही है। अब गधे ही सभ्य समाज की उम्मीद की आखिरी किरण हैं, जो मेहनतकशों का परचम थाम सकेंगे। मैं उन आदमियों को गधा समझता हूँ जो गधों की क्षमता का सही आँकलन नहीं कर पा रहे हैं। अरे साहब गधों के पास इतनी ताकत है कि वे अकेले अपने दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में सक्षम हैं, इसका जीता जागता उदाहरण हमारे पड़ौस ही के देश में देखा जा सकता है।
सच ही तो है, जब किसी सभ्य समाज के आदमी गधों जैसा आचरण करने लगें तो फिर गधों से ही उम्मीद रखना बेहतर होगा।
डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"..........
"एक मुसलमान या हिन्दू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता" यह बात प्रसिद्ध लेखक कृष्ण चंदर नें कई वर्षों पूर्व अपनी चर्चित पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' में कही थी और कमाल की बात है कि यह अब भी उतनी ही प्रासंगिक है।
लगता है ' माल-ए-ग़नीमत' समझे जाने वाले गधों के अच्छे दिन आने वाले हैं। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि हाल ही में सरकार ने आदेश जारी कर निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के गधों की आर्थिक स्थिति पर नज़र रखी जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि किसी भी गधे को किसी भी प्रकार की तकलीफ से ना गुज़रना पडे़, चाहे वह आर्थिक, सामाजिक या फिर शारीरिक ही क्यों ना हो।
हर गधे को कानून के तहत अपनी इच्छानुसार वि'चरण' करने की आज़ादी है, और यदि कोई आदमी उसके अधिकारों में रोडा अटकाता है तो इसकी सूचना तुरंत शासन को दी जाये। गधे हमारी सनातन संपत्ति हैं और इनका संरक्षण और संवर्द्धन हर जागरूक सरकार का दायित्व है। इसी तरह नस्लीय भेदभाव ना करते हुए हर नस्ल के गधों को समान सुविधाएँ देना सरकार का परम कर्तव्य है। हमारे एक चाचाजी हैं जो हमेशा एक उलाहना हमें देते हैं कि " बेटा कैसे दिन फिर गए हैं घोडों को घास नसीब नहीं और गधे गुलाब जामुन खा रहे हैं।"
मामला चाहे जो भी हो देर ही से सही आदमियों की सरकार ने गधों की सुध ली तो, और फिर कर्ज़ माफी और मुफ़्त में मिलने वाली तमाम सुविधाओं के चलते आदमी तो काम करने से रहे, सो सारा दारोमदार अब गधों पर ही है। अब गधे ही सभ्य समाज की उम्मीद की आखिरी किरण हैं, जो मेहनतकशों का परचम थाम सकेंगे। मैं उन आदमियों को गधा समझता हूँ जो गधों की क्षमता का सही आँकलन नहीं कर पा रहे हैं। अरे साहब गधों के पास इतनी ताकत है कि वे अकेले अपने दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में सक्षम हैं, इसका जीता जागता उदाहरण हमारे पड़ौस ही के देश में देखा जा सकता है।
सच ही तो है, जब किसी सभ्य समाज के आदमी गधों जैसा आचरण करने लगें तो फिर गधों से ही उम्मीद रखना बेहतर होगा।
डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"..........