मंगलवार, 23 जुलाई 2019

"माल-ए-ग़नीमत"

"माल-ए-ग़नीमत"
       "एक मुसलमान या हिन्दू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता" यह बात प्रसिद्ध लेखक कृष्ण चंदर नें कई वर्षों पूर्व अपनी चर्चित पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' में कही थी और कमाल की बात है कि यह अब भी उतनी ही प्रासंगिक है।

         लगता है ' माल-ए-ग़नीमत' समझे जाने वाले गधों के अच्छे दिन आने वाले हैं। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि हाल ही में सरकार ने आदेश जारी कर निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के गधों की आर्थिक स्थिति पर नज़र रखी जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि किसी भी गधे को किसी भी प्रकार की तकलीफ से ना गुज़रना पडे़, चाहे वह आर्थिक, सामाजिक या फिर शारीरिक ही क्यों ना हो।

            हर गधे को कानून के तहत अपनी इच्छानुसार वि'चरण' करने की आज़ादी है, और यदि कोई आदमी उसके अधिकारों में रोडा अटकाता है तो इसकी सूचना तुरंत शासन को दी जाये। गधे हमारी सनातन संपत्ति हैं और इनका संरक्षण और संवर्द्धन हर जागरूक सरकार का दायित्व है। इसी तरह नस्लीय भेदभाव ना करते हुए हर नस्ल के गधों को समान सुविधाएँ देना सरकार का परम कर्तव्य है। हमारे एक चाचाजी हैं जो हमेशा एक उलाहना हमें देते हैं कि " बेटा कैसे दिन फिर गए हैं घोडों को घास नसीब नहीं और गधे गुलाब जामुन खा रहे हैं।"

           मामला चाहे जो भी हो देर ही से सही आदमियों की सरकार ने गधों की सुध ली तो, और फिर कर्ज़ माफी और मुफ़्त में मिलने वाली तमाम सुविधाओं के चलते आदमी तो काम करने से रहे, सो सारा दारोमदार अब गधों पर ही है। अब गधे ही सभ्य समाज की उम्मीद की आखिरी किरण हैं, जो मेहनतकशों का परचम थाम सकेंगे। मैं उन आदमियों को गधा समझता हूँ जो गधों की क्षमता का सही आँकलन नहीं कर पा रहे हैं। अरे साहब गधों के पास इतनी ताकत है कि वे अकेले अपने दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में सक्षम हैं, इसका जीता जागता उदाहरण हमारे पड़ौस ही के देश में देखा जा सकता है।

              सच ही तो है, जब किसी सभ्य समाज के आदमी गधों जैसा आचरण करने लगें तो फिर गधों से ही उम्मीद रखना बेहतर होगा।

डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"..........

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

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चलो बात करें : एक अदद ज़िंदगी…………………….दोस्तों आज एक दुखद खबर से ...

चलो बात करें :
एक अदद ज़िंदगी…………………….
दोस्तों आज एक दुखद खबर से ...
: एक अदद ज़िंदगी……………………. दोस्तों आज एक दुखद खबर से मन बड़ा   खिन्न हो गया , जब पता चला कि आई . आई . टी . हैदराबाद के एक...

एक अदद ज़िंदगी…………………….

दोस्तों आज एक दुखद खबर से मन बड़ा  खिन्न हो गया, जब पता चला कि आई.आई.टी. हैदराबाद के एक छात्र नें ख़ुदकुशी कर ली, ऐसा क्यों हो  रहा है? आख़िर क्यों ? क्या सचमुच ये ज़िंदगी इतनी सस्ती है ? इतनी बेनूर है कि हम बिनावजह पशेमाँ हुए जा रहे हैं ? जो हम ज़रा सी मायूसी के चलते इससे पीछा छुड़ाने की सोच लेते हैं।  अरे जीना तो यही है कि -
"हर नफ़स उम्र--गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी'
ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का "

"मार्क" सिर्फ इसलिए परेशान था की परीक्षा में कुछ अंक कम मिले थे और इसलिए भी कि उसको इतना पढ़ने के बाद भी नौकरी  मिलने की उम्मीद नहीं थी। वाह रे व्यवस्था और वाह रे अपनी शिक्षा प्रणाली कि इतनी ऊँची पढ़ाई -लिखाई के बाद भी अगर ये आलम है तो हम क्या कर रहे हैं और कहाँ ले जा रहे है हैं हमारे देश के भविष्य को।
उस छात्र के द्वारा लिखीं गईं आख़िरी लाइनें दिल को रह रहकर झकझोर रहीं हैं -" हर एक युवा की तरह मेरे भी कुछ सपने थे, लेकिन अब  सब कुछ ख़ाली है, कुछ भी ठीक ना होते हुए भी   हमेशा मुस्कुराते हुए सबसे यही कहना कि सब कुछ ठीक है।" किसकी नज़र लग गई है इन युवा सपनों को, इनकी मुस्कराहट को कौन सा ग्रहण लग गया है, इस भरी पूरी उम्र में क्यों ये इतने हताश हैं ?
हँसने खेलने कि इस अवस्था में ये मायूसी क्यों? क्या अब ये युवक सपने भी नहीं देख सकते? इनकी नींदें क्यों उड़ी हुई है? युवा तो प्रतीक होते हैं जिंदादिली का , जोश का ,ऊर्जा का , उमंग का, और फिर इन परेशानियों से कैसा डरना। भरोसा रखना होगा अपने बाज़ुओं  पर, अपनी क़ाबिलियत पर और उससे ज़्यादा अपनी रग़ों में दौड़ते ग़र्म ख़ून की रवानी पर, इसे कभी ठंड़ा मत होने देना दोस्तों क्योंकि -

"ज़िंदगी ज़िंदादिली का है नाम
मुर्दा-दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं "

और "मार्क" ने भी माना है "इस एक अदद ज़िंदगी को रोज़ थोड़ी-थोड़ी जियोगे तभी इसका मज़ा ले पाओगे।"
मेरा मानना है कि ऊँची ग्रेड, ऊँची पोजीशन , ऊँची नौकरी, ऊँची तनख़्वाह और कुल मिलकर ऊँचा सामाजिक किरदार पाना ही ज़िंदगी का एक मात्र हासिल ना हो-

"इक मुअम्मा है समझने का समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का"


और हर किसी  को ये दीवानगी भरा ख़्वाब ज़िंदगी में एक बार ज़रूर देखना चाहिए। आदमी छोटी सी एक ज़िंदगी में ना जाने कितने ख़्वाब सँजो लेता है, कुछ सच होने वाले तो कुछ टूट जाने वाले, यह जानकर भी कि कुछ ख़्वाब सच नहीं हो पाएँगे वह झूठी उम्मीद लगा बैठता है ज़िंदगी से, ना जाने  क्यों ? एक तो ज़िंदगी पहले ही छोटी , उस पर झूठे सपनों का बोझ , फिर होता कुछ यूँ है कि ख़्वाब आगे - आगे और ज़िंदगी पीछे-पीछे, इस भागमभाग में ना तो ख़्वाब हाथ पाते हैं, ना ज़िंदगी, ख़्वाब बहुत आगे निकल जाते हैं और ज़िंदगी बहुत पीछे छूट जाती है, और तब पता चलता है कि -

"उम्र- -दराज़ माँग कर लाए थे चार दिन ,
दो आरज़ू में काट गए दो इंतज़ार में ".

अब आप ही सोचें इसमें गुनहगार कौन है ? ये देश, ये समाज , ये व्यवस्था या फिर हम ख़ुद ? सोचिएगा ज़रूर ...   

"ज़िंदगी का ज़िंदगी से वास्ता ज़िंदा रहे,
हम रहें जब तक हमारा हौसला ज़िंदा रहे."

डॉ.पुरुषोत्तम "पुष्प"