सोमवार, 30 जून 2025

भारतीय कला एवं संस्कृति के महान संवाहक: पद्मश्री डॉ.यशोधर मठपाल

 


उत्तराखंड में नैनीताल के समीप भीमताल मार्ग पर स्थित “लोक संस्कृति संग्रहालय” की स्थापना करने वाले पद्मश्री डॉ.यशोधर मठपाल पाषाण गुफा चित्रों के एक विश्वप्रसिद्ध विद्वान हैं।

29 जून को पंतनगर, उत्तराखंड में आयोजित एक कार्यक्रम में उनसे भेंट करने का सौभाग्य मिला। बड़ी ही सुखद अनुभूति हुई जब उन्होंने मुझसे श्रद्धेय हरिभाऊ वाकणकर, श्रद्धेय बाबा योगेंद्र जी एवं महाराष्ट्र के बारे में शुद्ध मराठी में आत्मीय चर्चा की। 

आपने दुनियाभर के कई देशों में जाकर इस विषय का अध्ययन किया है। जीवनभर संकलित और संग्रहित की इस विषय से संबंधित दुर्लभ जानकारियाँ उन्होंने अपने निवास के पास ही एक संग्रहालय में संजोकर रखी हैं ताकि कला, चित्रकारी और संस्कृति में रुचि रखने वाले शोधार्थी, विद्यार्थी एवं नई पीढ़ी के युवा इसको देख सकें, इसका उपयोग कर सके।

6 जून 1939 को अल्मोड़ा जिले के नौला ग्राम में जन्मे डॉ. यशोधर मठपाल ने रानीखेत में प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर, लखनऊ से ललित कला में पांच वर्षीय डिप्लोमा कर स्वर्ण पदक हासिल किया। उसके बाद आगरा में पढ़ाई की। पूना के डेक्कन कॉलेज से पुरात्व में पीएचडी हासिल की। अपने गुरु प्रसिद्ध पुरातत्वविद् पद्मश्री हरिभाऊ वाकणकर का भी आपको मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।  डॉ. मठपाल ने दुनिया के अनेक देशों में गुफाओं के पाषाण युगीन चित्रों का अध्ययन कर दो सौ के क़रीब शोध पत्र तैयार किए हैं।

डॉ मठपाल स्वयं भी एक सिद्धहस्त चित्रकार हैं अध्ययन के साथ-साथ उन्होंने पाषाण चित्रों की हू-ब-हू प्रतिकृतियां भी बनाई हैं। डॉ मठपाल का मानना है कि पाषाण युग में आदि मानव द्वारा पत्थरों पर उकेरे गए चित्रों को संभाल कर रखने का यही एक मात्र उपाय है। उनके इस दावे को 1986 में इंग्लैंड में हुए विश्व पुरातत्व सम्मेलन में भी मान्यता मिली। 

ऋषियों सा साधारण त्यागमय जीवन व्यतीत कर रहे  85 वर्षीय डॉ. मठपाल ने  गुफा चित्रों के साथ-साथ लोक संस्कृति से जुड़ी कई वस्तुओं को समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके इस प्रयास को यूनेस्को द्वारा भी मान्यता प्रदान की गई।

डॉ. मठपाल ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप आदि देशों की पौराणिक गुफाओं में सालों रहकर एक-एक चित्र पर शोध किया और उनकी वास्तविक आयु और कला के बारे में दुनियाभर के पुरातत्व विशेषज्ञों का मार्गदर्शन किया। देश-दुनिया में तीस से ज्यादा शहरों में आदि मानव के चित्र, पाषाण युग के पत्थर, जीवाश्म, आदि वस्तुओं की प्रदर्शनी लगा चुके डॉ मठपाल ने उत्तराखंड के भीमताल में अपना घर बसाया और यही 1983 में एक अनूठे लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना की।

डॉ यशोधर मठपाल को 2006 में राष्ट्रपति द्वारा चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

2012 में उन्हें नई दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित “रॉक कला पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन” में भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मान दिया गया। उन्हें राष्ट्रीय कला श्री सम्मान और उज्जैन का प्रतिष्ठित कालीदास सम्मान भी प्राप्त है।

भारतीय कला एवं संस्कृति के महान संवाहक इस महान कला ऋषि को सादर नमन है। 

डॉ. पुरुषोत्तम पाटील 


शुक्रवार, 27 जून 2025

मेरा देश बदल रहा है......

 


मेरा देश बदल रहा है......

   2 अक्तूबर गांधी जयंती स्वच्छता दिवस.........

आज सुबह आगरा से दिल्ली जाने के लिए निकला। स्टेशन पहुंच, प्लेटफॉर्म पर आया और गाड़ी का इंतज़ार करने लगा।

जहां बैठा था ठीक उसी के सामने प्लेटफॉर्म पर बहुत सारा पानी जमा हो गया था, ठीक वहीं जहां यात्री डिब्बे से उतरता है। कुछ देर बाद एक ट्रेन आयी एक व्यक्ति खाने का कुछ सामान लेने के लिए नीचे उतरा, उसे कुछ विलंब हो गया इतने में ट्रेन बढ़ चली, वह अपने डिब्बे की ओर लपका और ज्यों ही उसका पैर पानी में पड़ा वह लड़खड़ा गया, ईश्वर की कृपा से गिरा नहीं अन्यथा बड़ी दुर्घटना हो जाती।

बहुत दुख हुआ कि आज स्वच्छता दिवस है और यह स्थिति है। फिर ध्यान आया, क्यों न रेल्वे की ऑनलाइन 'रेल मदद' सुविधा का उपयोग किया जाए! वेबसाईट पर गया अपनी जानकारी भरी और उस जगह का फोटो अपलोड किया जहां प्लेटफार्म पर पानी जमा था। तुरंत संदेश आया आपकी शिकायत दर्ज़ हो गई है।

पांच मिनट के बाद उनके नेशनल सेंटर से फोन आया, शिकायत की मौखिक जानकारी पूछी गई,मैंने पुष्टि की। अगले पांच मिनट बाद जहां मैं बैठा था उस स्टेशन के मैनेजर का फोन आया उन्होंने भी शिकायत की मौखिक जानकारी ली और कहा कुछ ही देर में उस स्थान की सफ़ाई हो जाएगी जहां पानी जमा है, और असुविधा के लिए दुख व्यक्त किया।

तभी मेरी ट्रेन आ गई और मैं ट्रेन में बैठ अपने गंतव्य की ओर निकला ही था कि फोन फिर बज उठा। उन्हीं मैनेजर साहब का फोन था कहा सफ़ाई हो चुकी है और उनके पास सफाई के बाद के फोटो भी आ चुके हैं, यदि आप वहां हों तो एक बार तसल्ली कर लें। मैंने कहा मैं तो निकल चुका हूं लेकिन मुझे आप पर विश्वास है काम हो गया होगा, आपका बहुत धन्यवाद, कहकर बात ख़त्म हुई।

लेकिन बात यहां ख़त्म नहीं होती। सच बात यह है कि सकारात्मक बदलावों को खुले दिल से स्वीकारना चाहिए। जो अच्छा है उसे भी अच्छा कहा जाना चाहिए बिना किसी पूर्वाग्रह के।

मेरी ट्रेन 'राजधानी एक्सप्रेस' दिल्ली की ओर चली जा रही है, उसी दिल्ली की ओर जिस राजधानी के पहले वाले लाल फीते में जकड़े प्रशासनिक गलियारे अब मुक्त हो रहे हैं, सुलभ और सहज हो रहे हैं क्योंकि मेरा देश बदल रहा है.........

चलते चलते...

डॉ.पुरुषोत्तम पाटील

"समय का बचपन"

 


"समय का बचपन"

बचपन होता है हमारा और आपका

होता ही है सबका, अपना -अपना

होता तो इनका भी है और उनका भी


अंतर होता है बस...

सुविधाओं का, खिलौनों का, मैदान का और खेल की रंग बिरंगी पोशाकों का भी

बचपन मोहताज नहीं होता इन छद्म व्यापारिक प्रतीकों का

वह तो होता ही निश्छल है

बहते झरने सा 

जहां राह मिले दौड़ता भागता 

जहां मिले थाह वहां कुछ रुक -रुक जाता 


लेकिन मानने से ही तो है,अच्छा भी और बुरा भी और कई बार ठीक भी 

  

सभी के हिस्से में कहाँ होता है बचपन; बचपन वाला 

कुछ चूक जाते हैं जन्म लेने के बाद भी बचपन से 

नहीं आता बचपन कभी जीवन में उनके

हो जाते हैं वे सीधे बड़े

किसी टाईम मशीन के प्रभाव से मानो

हां, समय ही तो है सब कुछ 

जो करवाता है अहसास  

सुख का कभी -कभी

तो दुख का; हमेशा

क्योंकि सबके हिस्से का समय सरीखा नहीं होता....


डॉ. पी. पुरुषोत्तम


चित्र: मेरे द्वारा खींचा गया। स्थान: कानपुर सेंट्रल रेल्वे स्टेशन से लगी बस्ती।

गुरुवार, 26 जून 2025

अभी "मूड" नहीं है...!



अभी "मूड" नहीं है...!

भारत विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। सिंधु सरस्वती सभ्यता इसका प्रमाण है। अब तक खोजे गए हड़प्पाकालीन नगरों में वह सारी सुविधाएं मिलती हैं जो आज की आधुनिक टाउनशिप में उपलब्ध हैं।सिंधु घाटी सभ्यता में घरों से निकलने वाले गंदे पानी को सोखने के लिए पक्की ईंटों से बनी नालियों का एक जटिल नेटवर्क था, जो मुख्य नालियों से जुड़कर शहर के बाहर निकलती थी। इस सभ्यता के शहरों में घरों में स्नानागार, शौचालय और पक्की ईंटों से बनी ढकी हुई नालियों का एक विस्तृत नेटवर्क था, जो कचरा और गंदे पानी के कुशल निपटान में मदद करता था। सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में सड़कों के किनारे कूड़ेदान भी पाए गए हैं, जो कचरा प्रबंधन में मदद करते थे। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि भारतीय संस्कृति में साफ़ सफ़ाई का पुराने समय से ही कितना महत्व रहा है। यह 4500 साल पहले की बात है, जब दुनिया के अन्य हिस्सों में स्वच्छता की बुनियादी समझ भी नहीं थी। यह इस बात को भी सिद्ध करता है कि हम पहले से ही इतने गंदे नहीं थे?

फ़िर आख़िर बाद में ऐसा क्या हुआ जो हम इतने गंदगी पसंद हो गए कि जहां खाते वहीं थूंकने के लिए पीकदान भी रखने लगे? 

स्वच्छता जागरूकता के लिए चलाए गए कई कार्यक्रमों जैसे केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम 1986, पूर्ण स्वच्छता अभियान 1999, निर्मल भारत अभियान 2012  के बाद एक बार फिर एक नए "स्वच्छ भारत अभियान" की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय अगस्त 2014 के स्वतंत्रता दिवस पर की थी और 2 अक्टूबर 2014 को गांधी जयंती पर इसका शुभारंभ किया गया। इस दिन, मोदीजी ने भारत के नई दिल्ली के राजघाट में आयोजित एक सार्वजनिक सभा में भारत के नागरिकों को संबोधित किया और सभी से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया। लेकिन भारतीय किसी की सुनते हैं भला!


हम भारतीय इतने हठधर्मी हैं कि चाहें तो अच्छे अच्छों की सहज ही छुट्टी कर दें और न चाहें तो किसी के बाप में दम नहीं कि हमसे किसी बुरी बात का विरोध करवा ले, किसी बुरी व्यवस्था के विरोध में बुलवा ले। हमारा "मूड" जिसे हम प्यार से सहनशक्ति कहते हैं बड़ा ही गज़ब है। हम वर्षों तक मुगलों को सहते रहे, पुर्तगालियों को सहते रहे, अंग्रेजों को सहते रहे लेकिन मजाल है कि कोई उन्हें हमसे दूर कर उनसे छुटकारा दिलवा पाता, क्योंकि हमारा "मूड" नहीं था। आख़िर जब हमारा "मूड" हुआ तभी हमने उनको दूर किया। गंदगी का मामला भी कुछ ऐसा ही है। जब तक हमारा "मूड" नहीं बनेगा तब तक दुनिया की कोई शक्ति महाशक्ति हमसे उसे दूर नहीं कर सकती। 

यह हमारी प्रबल इच्छाशक्ति का ही परिचायक है कि आज तक इतने स्वच्छता कार्यक्रम चलाए गए लेकिन कोई भी कार्यक्रम हमें तनिक भी प्रभावित नहीं कर सका। हम जैसे थे वैसे ही हैं और वैसे ही रहेंगे भी!

सरकार का क्या है वह अपना काम करे हम अपना कर रहे हैं। कोई भी सरकार जनभावनाओं से खिलवाड़ तो नहीं कर सकती और इस तरह किसी अभियान की आड़ में हम पर स्वच्छता थोंप नहीं सकती। यह स्वच्छ भारत मिशन भी कचरे के ढेर पर ही औंधे मुंह पड़ा है?

हमने महात्मा गांधी का अभियान "फेल" कर दिया और लड़ते रहे! संजय गांधी का अभियान "फेल" कर दिया और बढ़ते रहे! फिर मोदी जी की क्या बिसात कि वे अपना स्वच्छता अभियान हमसे सफल करवा लें! सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी लेकिन गंदगी रहनी चाहिए! क्योंकि अभी हमारा "मूड" नहीं है।


डॉ. पुरुषोत्तम पाटील 


बुधवार, 2 दिसंबर 2020

" भोपाल गैस त्रासदी"


"रात के लगभग दस साढ़े दस बजे रहे थे, की अचानक अफरा तफरी मच गई लोगों की सांसें रुकने लगीं, दम घुटने लगा, आंखों में भयंकर जलन होने लगी, सब कुछ धुंधला होता जा रहा था, थमता जा रहा था। लेकिन दूसरी ओर औरतों, बच्चों, बूढ़ों की चीख पुकार बढ़ती जा रही थी, कान सुन्न हुए जा रहे थे, लोग पागलों की तरह इधर उधर भाग रहे थे, भागते हुए रास्तों ही पर गिर गिर कर दम तोड रहे थे।"

यह ना तो किसी फिल्म का सीन है ना ही किसी कहानी का अंश। यह हकीक़त है विश्व के औद्योगिक इतिहास की भीषणतम दुर्घटनाओं में से एक "भोपाल गैस त्रासदी"की।

 ०२ दिसंबर १९८४ की सर्दियों की वो स्याह रात भोपाल शायद ही कभी भूल पाए।  कीटनाशक बनाने वाली अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने के टैंक नंबर ६१० से अचानक एक ज़हरीली गैस का रिसाव होने लगा। चारों ओर भगदड़ मच गई, कारखाने के कर्मचारी जान बचाकर भागने लगे। समीपवर्ती बस्ती में जो लोग जाग रहे थे वे भी घरों से दूर भागने लगे लेकिन जो नींद में थे वे बदक़िस्मत फिर कभी जाग ना सके!

सारा पुलिस महकमा, चिकित्साकर्मी सड़कों पर उतर आए थे। एक दूसरे से पूछ रहे थे क्या हुआ है ?और क्या किया जाए ? लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था।  एक ओर भोपाल शहर के लोग बदहवास से आँखें मल रहे थे तो दूसरी ओर निष्प्रभावी,  असहाय सरकारी तंत्र हाथ मलते रह गया और पौ फटते फटते भोपाल शहर की ज़मीन पर लाशों के ढेर लग गए और आसमान में गिद्धों के झुंड मंडराने लगे।

इस त्रासदी में १५००० के करीब मासूम लोग मौत के मुंह में समा गए तो करीब ५००००० लोग प्रभावित हुए, लाखों लोग आजीवन विकलांग हो गए लेकिन सरकार का मन द्रवित नहीं हुआ, चार दिन बाद कंपनी के मुख्य प्रबंधक वाॅरेन एण्डरसन को न्यायालय ने ६००० रुपए की मामूली ज़मानत पर रिहा कर दिया और प्रदेश के तत्कालीन मुखिया ने उसे विशेष विमान से बाईज्ज़त दिल्ली रवाना कर दिया और दिल्ली की सरकार ने बिना रोक-टोक उसे अमेरिका बिदा कर दिया।

और छोड़ दिया भोपाल के पीड़ितों और उनकी आने वाली नस्लों को भगवान के भरोसे जीने के लिए या कहें भोगने के लिए अभिशप्त जीवन।

💐💐  विनम्र श्रद्धांजली 🙏🏻

,✍️✍️ डॉ. पी पुरुषोत्तम

रविवार, 22 नवंबर 2020

"अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने.....

ये शब्द हैं साहिर लुधियानवी द्वारा सन 1956 में देवानंद की फिल्म 'फंटूश' के लिए लिखे गए गीत के, जिसे गाया था किशोर कुमार ने, 1956 से आज लगभग 60 सालों में दुनिया आमूलाग्र बदल चुकी है। सब कुछ आभासी(Virtual) होता जा रहा है लेकिन नहीं बदला है तो इंसान, और वह बदलेगा भी कैसे आख़िर वह औलाद तो उसी लालची आदम ही की है।


इस गीत में शब्दों के जादूगर साहिर साहब ने इंसानी दिल की मतलबी प्रवृत्ति को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया है, वे कहते हैं - "दर्द हमारा कोई ना जाने, अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने"


आज लोग ना जाने किस ओर जा रहे हैं, इस आभासी (Virtual) जगत में सब कुछ बिल्कुल आभासी होता जा रहा है, रिश्ते - नाते, सुख, प्रेम, हँसी, समग्र रूप से संपूर्ण मानवीय व्यवहार ही आज एक अलग स्तर पर जा पहुँचा है। 


लोग हर बात में अपना मतलब ढूंढने लगे हैं, हर काम में फायदा देखने लगे हैं, सब कुछ स्वयं केंद्रित (self-centered) होता जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस सब से आदमी अकेला ही होता जा रहा है। मतलबी रिश्ते, बनावटी भावनाएं"अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने.....


ये शब्द हैं साहिर लुधियानवी द्वारा सन 1956 में देवानंद की फिल्म 'फंटूश' के लिए लिखे गए गीत के, जिसे गाया था किशोर कुमार ने, 1956 से आज लगभग 60 सालों में दुनिया आमूलाग्र बदल चुकी है सब कुछ आभासी(Virtual) होता जा रहा है लेकिन नहीं बदला है तो इंसान, और वह बदलेगा भी कैसे आखिर वह औलाद तो उसी लालची आदम ही की है।


इस गीत में शब्दों के जादूगर साहिर साहब ने इंसानी दिल की मतलबी प्रवृत्ति को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया है। वे कहते हैं - "दर्द हमारा कोई ना जाने, अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने"


आज लोग ना जाने किस ओर जा रहे हैं इस आभासी (Virtual) जगत में सब कुछ बिल्कुल आभासी होता जा रहा है, रिश्ते - नाते, सुख, प्रेम, हँसी, समग्र रूप से संपूर्ण मानवीय व्यवहार ही आज एक अलग स्तर पर जा पहुँचा है। 


लोग हर बात में अपना मतलब ढूँढने लगे हैं, हर काम में फायदा देखने लगे हैं, सब कुछ स्वयं केंद्रित (self-centered) होता जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस सब से आदमी अकेला ही होता जा रहा है। मतलबी रिश्ते, बनावटी भावनाएँ, नकली अपनापन इसके चलते आदमी शायद तथाकथित व्यावसायिक तरक्की तो कर लेगा, अपने व्यावसायिक हित भी साध लेगा, लेकिन अंदर से वह रहेगा खोखला, असंतुष्ट, अतृप्त और अकेला, इस दुनिया की भीड़ में।


'फेस इन द क्राउड' बनने की चाह में, अपने आपको अलग बताने के प्रयास में वह अकेला ही होता जा रहा है, और अपना चेहरा चमकाने के चक्कर में वह कितने अपने ही लोगों के चेहरे धुँधले कर रहा है और फिर भी अकेला पाता है अपने आप को।


आज हर कोई अपनी ही बात करना चाहता है , मैं - मैं, मेरा - मेरा, उसे दूसरे के सुख- दुख से कोई लेना देना नहीं और अगर है भी तो आभासी। वह इतना अंतर्मुख हो रहा है कि उसे सामने वाले की पीड़ा समझ ही नहीं आती। आज की इस शोर-शराबे वाली दुनिया में मन की बात वह समझ ही नहीं पा रहा है। निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर याद आता है कि -

"मुँह की बात सुने हर कोई 

दिल के दर्द को जाने कौन,

आवाज़ों के बाजा़रों में 

ख़ामोशी पहचाने कौन।"


आज की दुनिया का आदमी बहुत ही पढ़ा लिखा है, विज्ञान की मदद से हर काम चुटकी बजाते ही कर लेता है लेकिन काश कि वह इंसान के मन के भीतर चलने वाली पीड़ा और दुख को भी समझ पाता, ख़ामोशी को पढ़ पाता, उसके दर्द को बाँट पाता, लेकिन अफसोस इस मामले में वह आज भी अज्ञानी ही है, और अज्ञानी ही बना रहना चाहता है जिसमें वह अपनी भलाई समझता है।


आज का इंसान केवल दूसरे का उपयोग करना जानता है किसी से काम हो तब बर्ताव अलग और काम ख़त्म तो बर्ताव अलग और पुनः काम पड़े तो बर्ताव फिर पहले जैसा अवसरवादी। यहाँ नुकसान वही उठाता है जो ईमानदार हो, ईमानदार से तात्पर्य जो अपनी हर बात और व्यवहार को सच्चाई से निभाता है। आज लोग रिश्तों में अपनेपन के बजाय फ़ायदा नुक़सान ज़्यादा देखते हैं, कौनसा व्यक्ति अपने लिए कितना अधिक फा़यदेमंद होगा इस नज़रिए से रिश्ते रखे जाते हैं। किसी नें क्या ख़ूब कहा है -


"ज़रूरत बन गई रिश्ते में वरना,

यहाँ कोई किसी का अपना कब है।"


अंतर्जाल के इस मायावी जाल के चलते आदमी के लिए बहुत दूर की दुनिया उसके बहुत क़रीब हो गई है, और बहुत क़रीब की दुनिया से वह बहुत दूर होते जा रहा है, अभी भी समय है यदि वक्त़ रहते वह नहीं जागा तो शायद वह इतनी दूर तक आगे निकल जाए कि फिर अपनी दुनिया में लौट पाना उसके लिए मुमकिन ना हो पाए।

हम सभी को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा।

✍️✍️✍️डॉ.पी.पुरुषोत्तम



मंगलवार, 23 जुलाई 2019

"माल-ए-ग़नीमत"

"माल-ए-ग़नीमत"
       "एक मुसलमान या हिन्दू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता" यह बात प्रसिद्ध लेखक कृष्ण चंदर नें कई वर्षों पूर्व अपनी चर्चित पुस्तक 'एक गधे की आत्मकथा' में कही थी और कमाल की बात है कि यह अब भी उतनी ही प्रासंगिक है।

         लगता है ' माल-ए-ग़नीमत' समझे जाने वाले गधों के अच्छे दिन आने वाले हैं। दरअसल मामला कुछ यूँ है कि हाल ही में सरकार ने आदेश जारी कर निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के गधों की आर्थिक स्थिति पर नज़र रखी जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि किसी भी गधे को किसी भी प्रकार की तकलीफ से ना गुज़रना पडे़, चाहे वह आर्थिक, सामाजिक या फिर शारीरिक ही क्यों ना हो।

            हर गधे को कानून के तहत अपनी इच्छानुसार वि'चरण' करने की आज़ादी है, और यदि कोई आदमी उसके अधिकारों में रोडा अटकाता है तो इसकी सूचना तुरंत शासन को दी जाये। गधे हमारी सनातन संपत्ति हैं और इनका संरक्षण और संवर्द्धन हर जागरूक सरकार का दायित्व है। इसी तरह नस्लीय भेदभाव ना करते हुए हर नस्ल के गधों को समान सुविधाएँ देना सरकार का परम कर्तव्य है। हमारे एक चाचाजी हैं जो हमेशा एक उलाहना हमें देते हैं कि " बेटा कैसे दिन फिर गए हैं घोडों को घास नसीब नहीं और गधे गुलाब जामुन खा रहे हैं।"

           मामला चाहे जो भी हो देर ही से सही आदमियों की सरकार ने गधों की सुध ली तो, और फिर कर्ज़ माफी और मुफ़्त में मिलने वाली तमाम सुविधाओं के चलते आदमी तो काम करने से रहे, सो सारा दारोमदार अब गधों पर ही है। अब गधे ही सभ्य समाज की उम्मीद की आखिरी किरण हैं, जो मेहनतकशों का परचम थाम सकेंगे। मैं उन आदमियों को गधा समझता हूँ जो गधों की क्षमता का सही आँकलन नहीं कर पा रहे हैं। अरे साहब गधों के पास इतनी ताकत है कि वे अकेले अपने दम पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में सक्षम हैं, इसका जीता जागता उदाहरण हमारे पड़ौस ही के देश में देखा जा सकता है।

              सच ही तो है, जब किसी सभ्य समाज के आदमी गधों जैसा आचरण करने लगें तो फिर गधों से ही उम्मीद रखना बेहतर होगा।

डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"..........