"रात के लगभग दस साढ़े दस बजे रहे थे, की अचानक अफरा तफरी मच गई लोगों की सांसें रुकने लगीं, दम घुटने लगा, आंखों में भयंकर जलन होने लगी, सब कुछ धुंधला होता जा रहा था, थमता जा रहा था। लेकिन दूसरी ओर औरतों, बच्चों, बूढ़ों की चीख पुकार बढ़ती जा रही थी, कान सुन्न हुए जा रहे थे, लोग पागलों की तरह इधर उधर भाग रहे थे, भागते हुए रास्तों ही पर गिर गिर कर दम तोड रहे थे।"
यह ना तो किसी फिल्म का सीन है ना ही किसी कहानी का अंश। यह हकीक़त है विश्व के औद्योगिक इतिहास की भीषणतम दुर्घटनाओं में से एक "भोपाल गैस त्रासदी"की।
०२ दिसंबर १९८४ की सर्दियों की वो स्याह रात भोपाल शायद ही कभी भूल पाए। कीटनाशक बनाने वाली अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने के टैंक नंबर ६१० से अचानक एक ज़हरीली गैस का रिसाव होने लगा। चारों ओर भगदड़ मच गई, कारखाने के कर्मचारी जान बचाकर भागने लगे। समीपवर्ती बस्ती में जो लोग जाग रहे थे वे भी घरों से दूर भागने लगे लेकिन जो नींद में थे वे बदक़िस्मत फिर कभी जाग ना सके!
सारा पुलिस महकमा, चिकित्साकर्मी सड़कों पर उतर आए थे। एक दूसरे से पूछ रहे थे क्या हुआ है ?और क्या किया जाए ? लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था। एक ओर भोपाल शहर के लोग बदहवास से आँखें मल रहे थे तो दूसरी ओर निष्प्रभावी, असहाय सरकारी तंत्र हाथ मलते रह गया और पौ फटते फटते भोपाल शहर की ज़मीन पर लाशों के ढेर लग गए और आसमान में गिद्धों के झुंड मंडराने लगे।
इस त्रासदी में १५००० के करीब मासूम लोग मौत के मुंह में समा गए तो करीब ५००००० लोग प्रभावित हुए, लाखों लोग आजीवन विकलांग हो गए लेकिन सरकार का मन द्रवित नहीं हुआ, चार दिन बाद कंपनी के मुख्य प्रबंधक वाॅरेन एण्डरसन को न्यायालय ने ६००० रुपए की मामूली ज़मानत पर रिहा कर दिया और प्रदेश के तत्कालीन मुखिया ने उसे विशेष विमान से बाईज्ज़त दिल्ली रवाना कर दिया और दिल्ली की सरकार ने बिना रोक-टोक उसे अमेरिका बिदा कर दिया।
और छोड़ दिया भोपाल के पीड़ितों और उनकी आने वाली नस्लों को भगवान के भरोसे जीने के लिए या कहें भोगने के लिए अभिशप्त जीवन।
💐💐 विनम्र श्रद्धांजली 🙏🏻
,✍️✍️ डॉ. पी पुरुषोत्तम