गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

गीत गाता चल
आज मशहूर संगीतकार गीतकार श्री रवींद्र जैन की पुण्यतिथि है। रवींद्र जी  जिन्हें प्यार से सभी दादू कहते थे, एक ऐसा संगीतकार जिसने दृष्टिहीन होते हुए भी अपने मन की आँखों से इस संसार को एक अलग नज़रिए से देखा और  बड़े ही ख़ूबसूरत तरीक़े से हमारे सामने पेश भी किया। उन्होंने जो धुने बनाई वे अपने आप में अनूठी हैं, सबसे अलग, सबसे जुदा एक नए स्वाद सी जो एक बार चख लिया जाए तो फिर दिलो दिमाग से उतरता ही नहीं। हज़ारों गीतों में उनके गीत अपनी अलग रचनाधर्मिता के चलते पहचान में आ जाते हैं।
फ़िल्म संगीत की बात करें तो उनका पहला गीत रफी साहब ने गाया था, लेकिन उनकी पहचान बनाने वाला पहला गीत था फ़िल्म "सौदागर" का "सजना है मुझे, सजना के लिए"। यह गीत लोकप्रिय हुआ और यहाँ से वे आगे ही बढ़ते रहे।
उनकी धुनें दिल के तारों को छू जाती हैं, अर्थपूर्ण शब्दों पर सुरीले सुरों की कशीदाकारी से उनके गीतों में एक आकर्षक निखार आ जाता है जो आरोपित न होकर सहज होता है। उनके गीतों की शक्ति का आधार शास्त्रीय संगीत ही है, उन्होंने बड़े ही सहज तरीके से शास्त्रीय रागों का अपने गीतों में उपयोग किया है। और एक बात, लोकसंगीत का आधार उनके गीतों को जीवंत बनाता है और सीधे हृदय से जोड़ता है। नदिया के पार, गीत गाता चल, नैय्या जैसी फिल्में इसका सशक्त उदाहरण है।
उनके भक्ति गीतों में भी एक अनूठापन है, नवधा भक्ति के सारे रूप उनके भक्ति गीतों में देखने को मिलते हैं। श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, एक राधा एक मीरा या फिर रामायण का संगीत सब कुछ बड़ा ही मनभावन।
एक और बात जिसके लिए उन्हें याद किया जाएगा कि उन्होंने कई नए प्रतिभावान गायकों को अवसर दिया जैसे यसुदास, हेमलता, जसपालसिंह। मैं समझता हूँ कि किसी बडे कलाकार की महानता इसमे है कि वह अपने साथ उन लोगों को भी आगे बढ़ाए जो काबिल हैं । संगीत की दुनिया में रवींद्र जी का स्थान और उनका योगदान हमेशा सर्वोच्च है और रहेगा।
उनकी पुण्यतिथि पर सादर अभिवादन।
डॉ. पुरुषोत्तम 'पुष्प'💐💐💐 
"दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया दुनिया की आँधियों से भला ये बुझेगा क्या "

         आज साहिर साहब की बरसी है, साहिर के बारे में क्या कहूँ और क्या लिखूँ   समझ नहीं पा रहा हूँ, एक ऐसा शख़्स जिसका बचपन अमीरी में, जवानी संघर्ष में और बाक़ी उम्र अपनी ही रवानी में गुज़री लेकिन इनमें से किसी भी दौर में ना तो उनकी शायरी का दम कम हुआ ना ही शेरों का वज़न, उन्होंने अपनी कलम कभी सहज नहीं चलाई, एक एक गीत लिखने के लिए महीनों लगाते, पहले लिखते फिर उसे सँवारते रहते और जब पूरे मुतमईन हो जाते तभी गीत आगे देते चाहे निर्माता कितनी ही जल्दी करे।
        अदबी शायरी और रवायती शायरी में उन्होंने कभी फ़र्क नहीं किया उनकी शायरी का लहज़ा कभी भी नीचे नहीं उतरा इसीलिए वे एक अवाम पसंद शायर थे। जब ताजमहल नामक नज़्म में उन्होंने लिखा कि  " इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ " तो इस पर बड़ा बवाल मचा उर्दू जगत में उनकी काफी आलोचना हुई लेकिन वे अपनी बात से नहीं हटे।
साहिर ने जिंदगी में जिस भी चीज़ से मोहब्बत की बड़ी शिद्दत से की, फिर चाहे शायरी हो या कोई और, लेकिन एक महान कामयाब शायर जिसने जिंदगी में ना जाने कितने ही मोहब्बत के गीत- औ- अफ़साने लिखे , निजी जिंदगी में बेहद अकेले रहे, बचपन में पिता के प्यार से मरहूम और फिर अम्मी के जाने के बाद जिंदगी भर का अकेलापन, मोहब्बत के चर्चे तो बहुत हुए लेक़िन शायद उनकी क़लम की लकीरों में तो  बेतहाशा मोहब्बत बिखरी पड़ी थी क़िस्मत की लकीरों में नहीं।
अफ़सोस दुनियाँ जहां में लोगों के दिलों में मोहब्बत का जज़्बा सुलगाए रखने वाले इस अज़ीम शायर की क़ब्र पर आज कोई दिया जलाने वाला तक नहीं है।
 उनकी यादों का एक दिया हर मोहब्बत पसंद इंसान के दिल में जलता रहे, उनकी बरसी पर यही दुआ है।
डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"