रविवार, 22 नवंबर 2020

"अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने.....

ये शब्द हैं साहिर लुधियानवी द्वारा सन 1956 में देवानंद की फिल्म 'फंटूश' के लिए लिखे गए गीत के, जिसे गाया था किशोर कुमार ने, 1956 से आज लगभग 60 सालों में दुनिया आमूलाग्र बदल चुकी है। सब कुछ आभासी(Virtual) होता जा रहा है लेकिन नहीं बदला है तो इंसान, और वह बदलेगा भी कैसे आख़िर वह औलाद तो उसी लालची आदम ही की है।


इस गीत में शब्दों के जादूगर साहिर साहब ने इंसानी दिल की मतलबी प्रवृत्ति को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया है, वे कहते हैं - "दर्द हमारा कोई ना जाने, अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने"


आज लोग ना जाने किस ओर जा रहे हैं, इस आभासी (Virtual) जगत में सब कुछ बिल्कुल आभासी होता जा रहा है, रिश्ते - नाते, सुख, प्रेम, हँसी, समग्र रूप से संपूर्ण मानवीय व्यवहार ही आज एक अलग स्तर पर जा पहुँचा है। 


लोग हर बात में अपना मतलब ढूंढने लगे हैं, हर काम में फायदा देखने लगे हैं, सब कुछ स्वयं केंद्रित (self-centered) होता जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस सब से आदमी अकेला ही होता जा रहा है। मतलबी रिश्ते, बनावटी भावनाएं"अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने.....


ये शब्द हैं साहिर लुधियानवी द्वारा सन 1956 में देवानंद की फिल्म 'फंटूश' के लिए लिखे गए गीत के, जिसे गाया था किशोर कुमार ने, 1956 से आज लगभग 60 सालों में दुनिया आमूलाग्र बदल चुकी है सब कुछ आभासी(Virtual) होता जा रहा है लेकिन नहीं बदला है तो इंसान, और वह बदलेगा भी कैसे आखिर वह औलाद तो उसी लालची आदम ही की है।


इस गीत में शब्दों के जादूगर साहिर साहब ने इंसानी दिल की मतलबी प्रवृत्ति को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया है। वे कहते हैं - "दर्द हमारा कोई ना जाने, अपनी गरज़ के सब हैं दीवाने"


आज लोग ना जाने किस ओर जा रहे हैं इस आभासी (Virtual) जगत में सब कुछ बिल्कुल आभासी होता जा रहा है, रिश्ते - नाते, सुख, प्रेम, हँसी, समग्र रूप से संपूर्ण मानवीय व्यवहार ही आज एक अलग स्तर पर जा पहुँचा है। 


लोग हर बात में अपना मतलब ढूँढने लगे हैं, हर काम में फायदा देखने लगे हैं, सब कुछ स्वयं केंद्रित (self-centered) होता जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस सब से आदमी अकेला ही होता जा रहा है। मतलबी रिश्ते, बनावटी भावनाएँ, नकली अपनापन इसके चलते आदमी शायद तथाकथित व्यावसायिक तरक्की तो कर लेगा, अपने व्यावसायिक हित भी साध लेगा, लेकिन अंदर से वह रहेगा खोखला, असंतुष्ट, अतृप्त और अकेला, इस दुनिया की भीड़ में।


'फेस इन द क्राउड' बनने की चाह में, अपने आपको अलग बताने के प्रयास में वह अकेला ही होता जा रहा है, और अपना चेहरा चमकाने के चक्कर में वह कितने अपने ही लोगों के चेहरे धुँधले कर रहा है और फिर भी अकेला पाता है अपने आप को।


आज हर कोई अपनी ही बात करना चाहता है , मैं - मैं, मेरा - मेरा, उसे दूसरे के सुख- दुख से कोई लेना देना नहीं और अगर है भी तो आभासी। वह इतना अंतर्मुख हो रहा है कि उसे सामने वाले की पीड़ा समझ ही नहीं आती। आज की इस शोर-शराबे वाली दुनिया में मन की बात वह समझ ही नहीं पा रहा है। निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर याद आता है कि -

"मुँह की बात सुने हर कोई 

दिल के दर्द को जाने कौन,

आवाज़ों के बाजा़रों में 

ख़ामोशी पहचाने कौन।"


आज की दुनिया का आदमी बहुत ही पढ़ा लिखा है, विज्ञान की मदद से हर काम चुटकी बजाते ही कर लेता है लेकिन काश कि वह इंसान के मन के भीतर चलने वाली पीड़ा और दुख को भी समझ पाता, ख़ामोशी को पढ़ पाता, उसके दर्द को बाँट पाता, लेकिन अफसोस इस मामले में वह आज भी अज्ञानी ही है, और अज्ञानी ही बना रहना चाहता है जिसमें वह अपनी भलाई समझता है।


आज का इंसान केवल दूसरे का उपयोग करना जानता है किसी से काम हो तब बर्ताव अलग और काम ख़त्म तो बर्ताव अलग और पुनः काम पड़े तो बर्ताव फिर पहले जैसा अवसरवादी। यहाँ नुकसान वही उठाता है जो ईमानदार हो, ईमानदार से तात्पर्य जो अपनी हर बात और व्यवहार को सच्चाई से निभाता है। आज लोग रिश्तों में अपनेपन के बजाय फ़ायदा नुक़सान ज़्यादा देखते हैं, कौनसा व्यक्ति अपने लिए कितना अधिक फा़यदेमंद होगा इस नज़रिए से रिश्ते रखे जाते हैं। किसी नें क्या ख़ूब कहा है -


"ज़रूरत बन गई रिश्ते में वरना,

यहाँ कोई किसी का अपना कब है।"


अंतर्जाल के इस मायावी जाल के चलते आदमी के लिए बहुत दूर की दुनिया उसके बहुत क़रीब हो गई है, और बहुत क़रीब की दुनिया से वह बहुत दूर होते जा रहा है, अभी भी समय है यदि वक्त़ रहते वह नहीं जागा तो शायद वह इतनी दूर तक आगे निकल जाए कि फिर अपनी दुनिया में लौट पाना उसके लिए मुमकिन ना हो पाए।

हम सभी को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा।

✍️✍️✍️डॉ.पी.पुरुषोत्तम