सोमवार, 9 जनवरी 2017

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते.................


                    जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब माध्यमिक स्तर पर एक विषय संस्कृत भी पढ़ाया जाता था, और उसमें कई प्रकार के श्लोक और सुभाषित हमसे कण्ठस्थ  कराए जाते थे, आज सब तो नहीं किन्तु कुछ  का स्मरण रह-रहकर हो आता है, जैसे - 

"विद्या विनयेन शोभते "। 
या 
"विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
अथवा 
 " यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

                 इन पंक्तियों का स्मरण हो आना अनायास नहीं है, विज्ञान में ऐसा माना जाता है कि मनुष्य के मस्तिष्क में हर देखी, सुनी एवं पढ़ी हुई बात अंकित हो जाती है तथा जब उस बात से सम्बंधित कोई घटना या प्रसंग सामने आता है तो वे संदर्भ पुनः स्मरण हो आते हैं। अब इस बार मेरे मस्तिष्क में इन सन्दर्भों के जागने के कई कारण हैं जैसे पिछले कुछ  दिनों से समाज में घट रहीं घटनाएँ या सच कहें तो दुर्घटनाएँ जिनसे मेरा ही नहीं हर उस आम सभ्य भारतीय व्यक्ति का मन आहत है जो किसी का बेटा-बेटी , भाई-बहन, माता-पिता इत्यादि है । एक घटना है बंगलुरु की, दूसरी है दिल्ली की और कुछ देश के अन्य हिस्सों की जहाँ महिलाओं के साथ छेड़खानी की शर्मनाक घटनाएं हुई हैं। 
                    ऐसा भी पता चल रहा है कि इन घटनाओं को अंजाम देने वाले अधिकांश पढ़े-लिखे महाविद्यालयीन विद्यार्थी ही हैं, तब मेरा सिर चकराने लगता है और मैं सोचने पर विवश हो जाता हूँ की क्या हमें जो पढ़ाया गया या पढ़ाया जा रहा है वह कहीं न कहीं दोषपूर्ण है? या तो फिर हममें उस बात को पढने - समझने के उपरान्त  भी उसके आंकलन की क्षमता नहीं है?, या तो फिर हम उन बातों को ठीक से समझना ही नहीं चाहते हैं ? आखिर सारा माजरा है क्या ? हमने तो आज तक यही सीखा और समझा  है कि   विद्या विनयशीलता देती है, इसी तरह विनयशीलता विद्यावान व्यक्ति के व्यक्तित्व का मुख्य तत्व है, और इसी से उसके व्यक्तित्व में निखार आता है। किन्तु इन दोनों ही बातों में आजकल विरोधाभास दिखाई देने लगा है, ' विद्या विनयेन शोभते ' अर्थात विद्यावान व्यक्ति की विद्वत्ता उसकी विनयशीलता से ही सुशोभित होती है, किन्तु अब जहां तक दूसरी  बात है कि 'विद्या ददाति विनयम' अर्थात विद्या विनयशीलता प्रदान करती है, इस बात में मुझे सन्देह होने लगा है? आजकल के अधिकाँश विद्यार्थीयों में विनय के भाव का लोप  होता जा रहा है, विद्यार्थियों के पार्टी और हुड़दंग , तेज गाड़ी चलाना , छेड़खानी आदि किस्से आम हो रहे हैं. आखिर कौन हैं ये लोग जो झुठला रहे हैं सनातन मान्यताओं को जो शायद उन्हें रूढ़ियाँ लगाने लगी हों, क्या स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में भेद की महीन रेखा का भान नहीं है इन्हें इस तेजी से परिवर्तित होते डिजिटल युग में, या कि वे समझना नहीं चाहते जानबूझकर ?    
                    दूसरी बात हमने यह भी सीखी कि 'नारी का सम्मान जहां बसते हैं भगवान वहाँ ', यह ना तो कोई सोचने वाली बात है ना ही समझने वाली यह हमारे रक्त  ही में होना  चाहिए। मुझे एक बात बिलकुल भी समझ में नहीं आती कि समाज के लगभग हर व्यक्ति की एक माँ, बहन, बेटी या पत्नी होती ही है जिससे वह ह्रदय की गहराइयों से प्रेम करता है, उसके हर दुःख पर दुखी होता है, उसके हर सुख से स्वयं को समरस कर लेता है फिर जब उसे किसी दूसरे की माँ, बहन, बेटी या पत्नी दिखाई देती है तब वह क्यों कर वहशी  बन जाता है , उसे उस समय उस महिला में क्यों अपनी  माँ, बहन, बेटी या पत्नी की छवि दिखाई नहीं पड़ती। कुछ लोग कहने लगे हैं कि हमें अपने पुत्रों को सिखाना चाहिए कि वे महिलाओं का सम्मान करें , अब यह भी सिखाना पड़ेगा हमें ? फिर हम अब तक सीख क्या रहे थे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्चिन्ह लगा देता है आधुनिक युग के उन्नत एवं विकासशील भारत के अस्तित्व पर? क्या हम केवल ऊपर-ऊपर विकसित  होते जा रहे हैं भीतर से वही आदिम जिसे ना तो रिश्ते समझते थे ना भाषा ना सामाजिकता जिसे समझती थी तो बस पाशविकता।  
                मित्रों सोचनें का समय बीत चुका है , समय है कुछ करने का, अपने-अपने स्तर पर अपने - अपने स्थान पर ही सही, कुछ न कुछ तो करना ही होगा। किसे क्या समझाना है या पढ़ाना - सिखाना है वह करें, किन्तु किसी भी कीमत पर यह सब रुकना ही चाहिए। अन्यथा हमें लज्जा का अनुभव होगा यह कहते कि हमारी संस्कृति हजारो वर्ष पुरानी है, संदेह होगा संसार को कि कभी सीखने आती थी दुनिया हमसे तक्षशिला और नालंदा में, नहीं मानेगा विश्व की सचमुच स्वामी विवेकानंद नें उस पाश्चात्य महिला से जो उनसे विवाह कर उन जैसी  ही सुन्दर संतान पाना चाहती थी कहा होगा की तुम मुझे अपना  पति  बनाने  की बजाय बेटा बना लो।                
                   स्वयं भी समझें  और अपनी संतानो को भी समझाएं अर्थ भारतीय संस्कृति के, मूल्यों के , संस्कारों के जिन्हें पूजती है दुनिया आज भी,  इससे पहले की स्थितियां हाथ से बालू की   भाँति  फिसल जाएं और हम हाथ मलते रह जाएं .......

आपका
डॉ. पुरुषोत्तम 'पुष्प'



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