एक अदद ज़िंदगी…………………….
दोस्तों आज एक दुखद खबर से मन बड़ा
खिन्न हो गया, जब पता चला कि आई.आई.टी. हैदराबाद के एक छात्र नें ख़ुदकुशी कर ली, ऐसा क्यों हो
रहा है? आख़िर क्यों ? क्या सचमुच ये ज़िंदगी इतनी सस्ती है ? इतनी बेनूर है कि हम बिनावजह पशेमाँ हुए जा रहे हैं ? जो हम ज़रा सी मायूसी के चलते इससे पीछा छुड़ाने की सोच लेते हैं।
अरे जीना तो यही है कि -
"हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी'
ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का "
"मार्क" सिर्फ
इसलिए परेशान था की परीक्षा में कुछ अंक
कम मिले
थे और इसलिए भी कि उसको इतना पढ़ने के बाद भी नौकरी
मिलने की उम्मीद नहीं थी। वाह रे व्यवस्था और वाह रे अपनी शिक्षा प्रणाली कि इतनी ऊँची पढ़ाई -लिखाई के बाद भी अगर ये आलम है तो हम क्या कर रहे हैं और कहाँ ले जा रहे है हैं हमारे देश के भविष्य को।
उस छात्र के द्वारा लिखीं गईं आख़िरी लाइनें दिल को रह रहकर झकझोर रहीं हैं -" हर
एक युवा की तरह मेरे भी कुछ सपने थे, लेकिन अब
सब कुछ ख़ाली है, कुछ भी ठीक ना होते हुए भी
हमेशा मुस्कुराते हुए सबसे यही कहना कि सब कुछ ठीक है।" किसकी
नज़र लग गई है इन युवा सपनों को, इनकी मुस्कराहट को कौन सा ग्रहण लग गया है, इस भरी पूरी उम्र में क्यों ये इतने हताश हैं ?
हँसने खेलने कि इस अवस्था में ये मायूसी क्यों? क्या अब ये युवक सपने भी नहीं देख सकते? इनकी नींदें क्यों उड़ी हुई है? युवा तो प्रतीक होते हैं जिंदादिली का , जोश का ,ऊर्जा का , उमंग का, और फिर इन परेशानियों से कैसा डरना। भरोसा रखना होगा अपने बाज़ुओं पर, अपनी क़ाबिलियत पर और उससे ज़्यादा अपनी रग़ों में दौड़ते ग़र्म ख़ून की रवानी पर, इसे कभी ठंड़ा मत होने देना दोस्तों क्योंकि -
"ज़िंदगी ज़िंदादिली का है नाम
मुर्दा-दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं "
और "मार्क"
ने भी माना है "इस
एक अदद ज़िंदगी को रोज़ थोड़ी-थोड़ी जियोगे तभी इसका मज़ा ले पाओगे।"
मेरा मानना है कि ऊँची ग्रेड, ऊँची पोजीशन , ऊँची नौकरी, ऊँची तनख़्वाह और कुल मिलकर ऊँचा सामाजिक किरदार पाना ही ज़िंदगी का एक मात्र हासिल ना हो-
"इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का"
और हर किसी
को ये दीवानगी भरा ख़्वाब ज़िंदगी में एक बार ज़रूर देखना चाहिए। आदमी छोटी सी एक ज़िंदगी में ना जाने कितने ख़्वाब सँजो लेता है, कुछ सच होने वाले तो कुछ टूट जाने वाले, यह जानकर भी कि कुछ ख़्वाब सच नहीं हो पाएँगे वह झूठी उम्मीद लगा बैठता है ज़िंदगी से, ना जाने
क्यों ? एक तो ज़िंदगी पहले ही छोटी , उस पर झूठे सपनों का बोझ , फिर होता कुछ यूँ है कि ख़्वाब आगे - आगे और ज़िंदगी पीछे-पीछे, इस भागमभाग में ना तो ख़्वाब हाथ आ पाते हैं, ना ज़िंदगी, ख़्वाब बहुत आगे निकल जाते हैं और ज़िंदगी बहुत पीछे छूट जाती है, और तब पता चलता है कि -
"उम्र-ए -दराज़ माँग कर लाए थे चार दिन ,
दो आरज़ू में काट गए दो इंतज़ार में ".
अब आप ही सोचें इसमें गुनहगार कौन है ? ये देश, ये समाज , ये व्यवस्था या फिर हम ख़ुद ? सोचिएगा ज़रूर ...
"ज़िंदगी का ज़िंदगी से वास्ता ज़िंदा रहे,
हम रहें जब तक हमारा हौसला ज़िंदा रहे."
डॉ.पुरुषोत्तम "पुष्प"
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