गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

"दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया दुनिया की आँधियों से भला ये बुझेगा क्या "

         आज साहिर साहब की बरसी है, साहिर के बारे में क्या कहूँ और क्या लिखूँ   समझ नहीं पा रहा हूँ, एक ऐसा शख़्स जिसका बचपन अमीरी में, जवानी संघर्ष में और बाक़ी उम्र अपनी ही रवानी में गुज़री लेकिन इनमें से किसी भी दौर में ना तो उनकी शायरी का दम कम हुआ ना ही शेरों का वज़न, उन्होंने अपनी कलम कभी सहज नहीं चलाई, एक एक गीत लिखने के लिए महीनों लगाते, पहले लिखते फिर उसे सँवारते रहते और जब पूरे मुतमईन हो जाते तभी गीत आगे देते चाहे निर्माता कितनी ही जल्दी करे।
        अदबी शायरी और रवायती शायरी में उन्होंने कभी फ़र्क नहीं किया उनकी शायरी का लहज़ा कभी भी नीचे नहीं उतरा इसीलिए वे एक अवाम पसंद शायर थे। जब ताजमहल नामक नज़्म में उन्होंने लिखा कि  " इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ " तो इस पर बड़ा बवाल मचा उर्दू जगत में उनकी काफी आलोचना हुई लेकिन वे अपनी बात से नहीं हटे।
साहिर ने जिंदगी में जिस भी चीज़ से मोहब्बत की बड़ी शिद्दत से की, फिर चाहे शायरी हो या कोई और, लेकिन एक महान कामयाब शायर जिसने जिंदगी में ना जाने कितने ही मोहब्बत के गीत- औ- अफ़साने लिखे , निजी जिंदगी में बेहद अकेले रहे, बचपन में पिता के प्यार से मरहूम और फिर अम्मी के जाने के बाद जिंदगी भर का अकेलापन, मोहब्बत के चर्चे तो बहुत हुए लेक़िन शायद उनकी क़लम की लकीरों में तो  बेतहाशा मोहब्बत बिखरी पड़ी थी क़िस्मत की लकीरों में नहीं।
अफ़सोस दुनियाँ जहां में लोगों के दिलों में मोहब्बत का जज़्बा सुलगाए रखने वाले इस अज़ीम शायर की क़ब्र पर आज कोई दिया जलाने वाला तक नहीं है।
 उनकी यादों का एक दिया हर मोहब्बत पसंद इंसान के दिल में जलता रहे, उनकी बरसी पर यही दुआ है।
डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"

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