शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

आने वाला पल................

           दोस्तों  पुराना साल अपने वजूद के आख़िरी लम्हे गिन  रहा है, इस दुनिया में हर चीज़ फ़ानी है यह तो हम सभी बखूबी जानते हैं , लेकिन पुराने की चाह है कि छूटती ही नहीं, पुराना प्यार, पुरानी तक़रार और ना जाने क्या क्या? लेकिन दिल में एक नया जोश भी है आने वाले नए पल  को लेकर कि शायद अब कुछ अच्छा हो जाए. लेकिन कई लोग यह सोचते हैं कि ज़िन्दगी कमबख़्त बड़ी संगदिल है इसे किसी से मोहब्बत नहीं, यह बस अपनी ही मस्ती में होती है, हम उम्र भर ना  जाने इसके कितने नखरे उठाते हैं, इसके लिए कितने फ़िक्रमंद रहते हैं और एक यह है कि हमारी ख़बर  ही नहीं लेती, फिराक़ साहब कहते हैं  -
"कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका"
            लेकिन महज़ इस बात ही से हम जिंदगी से किनारा नहीं कर सकते, वह हमसे कैसा ही बर्ताव करे, हमें परेशान करे , हमें तकलीफें दे, हमें चिढ़ाती रहे ताउम्र, हम उसे नकार नहीं सकते, हमें उससे दिल लगाना ही होगा चाहे वह बेदिली रखे हमसे, बख्त  लायलपुरी कहते हैं -
"कभी आँखों पे कभी सर पे बिठाए रखना
ज़िंदगी तल्ख़ सही दिल से लगाए रखना"
           हमारा माशूक़ हमसे कितनी  ही बेऱुखी करे हम  उससे तो नाराज़ नहीं होते हमेशा उसे मनाने के लिए उसके पीछे -पीछे घूमते हैं, वह नाराज ना  हो इस बात का बड़ा ख़याल रखते हैं फिर यह तो हमारी ज़िंदगी है अपनी, इससे भला कैसी नाराज़गी, और भला वह हमसे नाराज़ हो भी क्यों ना हम दुनिया भर के सारे काम करेंगे, यहाँ जाएंगे , वहाँ जाएंगे, इससे बतियाएंगे , उससे बोलेंगे , लेकिन खुद से कभी नहीं या फिर बहुत कम, अल्लामा इक़बाल क्या खूब कहते हैं -
"अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन". 
            सारा मसला ही यह है की हम ख़ुद कभी अपना नहीं बन पाते और दोष ज़िंदगी को देते रहते हैं कि  वह कभी हमारा साथ नहीं देती, हमसे फ़ासला  बनाए रखती है, दोस्तों फ़ासले और नजदीकियाँ रखना इंसानी फ़ितरत है, क़ायनाती नहीं, हम अपने मतलब और सहूलियत से ये सब करते हैं. सीधा सा मामला है हम जैसा बर्ताव जिंदगी के साथ करेंगे वह भी वैसा ही सलूक़ हमसे करेगी, आखिर जिंदगी की भी कोई जिंदगी है कि नहीं, सारा दारोमदार हम ही पर है क्योंकि अल्लामा इक़बाल कहते हैं-

"अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी"

            असल बात यही है की हम अपने और अपनी जिंदगी के लिए क्या करना चाहते है और असल में करते क्या हैं, अगर इस बात को हम ठीक से समझ लें तो सारा मसला हल हो जाए और जिंदगी हमें सचमुच बहुत ख़ूबसूरत लगने लगेगी बशर्ते कोशिश ईमानदारी से हो.
           दोस्तों हम नए साल की दहलीज पर खड़े हैं, एक नया आसमां हमारी राह देखता है , एक नये दौर में हम जाने को हैं तो क्यों ना हम अपना दिल भी इस बार कुछ नया कर लें, और तय कर लें कि आने वाले पूरे साल हम अपने आप से हर रोज़ मिलकर ख़ुद  से  अपने दिल का सुख-दुःख बाँटेंगे और कुछ उसका हाल-ए- दिल पूछेंगे।
आप सभी को आने वाला नया साल मुबारक हो इसी दुआ के साथ रुकता हूँ, फिर मिलेंगे नए साल में, नई उम्मीद के साथ , नए हौसले के साथ और नई बात के साथ. ...... 
"न कोई रंज का लम्हा किसी के पास आए
ख़ुदा करे कि नया साल सब को रास आए"

आपका 

डॉ. पुरुषोत्तम "पुष्प"


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